Sunday, January 31, 2016

On Hindi Grammar हिंदी व्याकरण: Bhaashaa Mein Saahacarya Association in Language

On Hindi Grammar हिंदी व्याकरण: Bhaashaa Mein Saahacarya Association in Language: भाषा में साहचर्य वृषभ प्रसाद जैन मेरे वि़द्यागुरु प द्म भूषण आचार्य पण्डित विद्यानिवास मिश्र जी अक्सर यह कहते थे कि किसी भी भाषा को...

Monday, January 4, 2016

Bhaashaa Mein Saahacarya Association in Language

भाषा में साहचर्य
वृषभ प्रसाद जैन

मेरे वि़द्यागुरु पद्मभूषण आचार्य पण्डित विद्यानिवास मिश्र जी अक्सर यह कहते थे कि किसी भी भाषा को और उसके व्याकरण को सीखने के लिए भाषा में व्याप्त या भाषा की प्रकृति में व्याप्त साहचर्यको जानना चाहिए। अब प्रश्न उठेगा कि साहचर्यक्या है?......... भाषा में रहने वाली भाषिक इकाइयों का प्रयोग चाहे जहाँ या चाहे जिसके साथ नहीं होता। भाव यह है कि कौन-सी क्रिया किस अवस्था वाले कर्ता के साथ प्रयुक्त होती है या किस प्रकार की विशेष क्रिया के साथ कौन-सा कर्ता प्रयुक्त होता है, -यह जानना ही कर्ता और क्रिया के साहचर्य को जानना है या क्रिया और कर्ता के साहचर्य को जानना है। कोई भी भाषा स्वछन्द बिहार की अनुमति नहीं देती, वह अपने घटकों के लिए यह निर्धारित करके चलती है कि कौन-सी इकाई किस घटक विशेष के साथ या किन्हीं दूसरे घटकों के साथ किन विशेष परिस्थितियों में प्रयुक्त होती है। भाषा के सभी घटकों या सभी इकाइयों के सभी घटकों के सन्दर्भों की स्थिति विशेष को जानना, भाषा के घटकों के साहचर्य को जानना है। उदाहरण के लिए हिंदी की एक क्रिया भड़कनाको लेते हैं। अब देखना यह है कि यह भड़कनाक्रिया किस-किस प्रकार के कर्ताओं को लेती है या के साथ आती है। आज के दैनिक जागरण 27.3.2014 के पहले पेज का प्रमुख शीर्षक है लापरवाही से भड़का दंगा’, तो बात साफ हुई कि भडकनाक्रिया के साथ दंगा कर्ता में रूप में आ सकता है। .......पर क्या 1. पानी भड़का, या 2. बर्फ भड़की, या 3. गले का हार भड़का; आदि वाक्य हिंदी के स्वीकृत वाक्य हो सकते हैं?....... मुझे लगता है कि इन 1, 2, 3 वाक्यों में से कोई भी वाक्य हिंदी का स्वीकृत वाक्य नहीं है। इसका मतलब साफ हुआ कि भड़कनाक्रिया के साथ बर्फ की, पानी की, गले के हार की, कर्ता के रूप में हिंदी में स्वीकृत नहीं है। इसीलिए यह-सब भडकनाक्रिया के साहचर्य में नहीं हैं। भड़कनाक्रिया के साथ प्रमुख रूप में जो घटक आ सकते हैं, वे हैं- क्रोध, आग, व्यक्ति-विशेष, समूह-विशेष आदि-आदि। जैसे-
1.    इस गाँव में आग भड़की।
2.    उसका क्रोध भड़का।
3.    कैकेयी की बात सुनते ही राजा दशरथ भड़के (व्यक्तिवाचक)।
4.    मैं, तुम, आप (कोई भी सर्वनाम) भड़के।
5.      अफवाह फैलते ही भीड़ (समूह वाचक) भड़की।
ऐसे ही हिंदी की कुछ-और क्रियाओं को लेकर अब बात करते हैं- फड़कना’, इसका साहचर्य है आँख के साथ, हाथ के साथ, जंघा के साथ, भौंह के साथ, आदि-आदि।
एक और क्रिया है- जारी करना’ -इसके साथ आ सकते हैं आदेश, फरमान, नोटिस, पासपोर्ट, टिकट, वीजा, रसीद आदि-आदि। यथा- आदेश जारी करना, फरमान जारी करना, नोटिस जारी करना, पासपोर्ट जारी करना, टिकट जारी करना, वीजा जारी करना, रसीद जारी करना, आदि-आदि में।
एक और क्रिया है- पूरी करना। अब देखिये क्रिया पूरी करनाकिन-किन शब्दों के साथ प्रयुक्त होती है ज़रूरतें, माँगें, शर्तें, आवश्कताएँ, जिम्मेदारी, आदि-आदि। यथा- ज़रूरतंे पूरी करना, माँगंे पूरी करना, शर्तें पूरी करना, आवश्यकताएँ पूरी करना, जिम्मेदारी पूरी करना, आदि-आदि में।
एक और क्रिया है- हासिल करना’ -इसके साथ जो शब्द आते हैं, वे हैं- ऊर्जा, कुव्वत, शिक्षा, सहानुभूति, शिल्प, दौलत, आदि-आदि। जैसे- ऊर्जा हासिल करना, कुव्वत हासिल करना, शिक्षा हासिल करना, सहानुभूति हासिल करना, शिल्प हासिल करना, दौलत हासिल करना, आदि-आदि में।
एक और क्रिया है-अच्छा होना’ -इसके साथ आ सकते हैं- सेहत, माली हालत, पहले से, आदि-आदि। जैसे- सेहत अच्छा होना, माली हालत में अच्छा होना, पहले से अच्छा होना, आदि-आदि में।
अब एक और क्रिया अदा करनाको लेते हैं- इसके साथ शब्द जो आ सकते हैं, वे हैं- कर्ज़ा, शुक्रिया, बिल, किराया, आदि-आदि। जैसे- कर्ज़ा अदा करना, शुक्रिया अदा करना, बिल अदा करना, किराया अदा करना, आदि-आदि में।
एक क्रिया है रोना। इस क्रिया का कर्ता कोई प्राणवान् और संवेदनशील व्यक्ति या उसका वाचक सर्वनाम ही हो सकता है, अन्य कोई नहीं तथा यह रोनाक्रिया दु:ख-वाचक, पीड़ा-वाचक या अत्यधिक प्रसन्नता-वाचक परिस्थित में ही घटती है, इसलिए इसप्रकार की स्थिति-वाचक कोई अधिकरण संरचना भी आ सकती है। यह है रोनाक्रिया का साहचर्य। उदाहरण -
1.    पुत्र पिता की मृत्यु पर रोया।
2.    गुरु के पीटने पर छात्र रोया।
3.    कोई वारिस न था, नाती के जन्म होने पर दादी हर्ष से रो पड़ी, उसकी आँखो में आँसू छलक आए।
एक क्रिया है जाना। हिन्दी की जानाक्रिया ऐसी है कि वह सभी प्रकार की कारक संरचनाओं को लेती है। भाव यह है कि हन्दी की जानाक्रिया के साथ सभी प्रकार की कारक संरचनाओं का साहचर्य स्वीकृत है।
मोहन रासन और पैसा लाने के लिए बस से कानपुर से अपने पिता जी के गाँव सोहनपुर रात में जा रहा है।
    अब देखिए ऊपर के इस वाक्य में कर्ता से लेकर अधिकरण तक की वाचक सभी संरचनाएँ आई हैं, यहाँ तक कि इसमें सम्बन्ध-वाचक संरचना भी प्रयुक्त हुई है, पर इसप्रकार की सभी संरचनाएँ इससे पहले उल्लखित सभी क्रियाओं के साथ नहीं  आ सकतीं, क्योंकि हिन्दीं भाषा की प्रकृति में विद्यमान साहचर्य उस तरह की अनुमति नहीं देता। हिन्दीं वाक्य के व्याकरण में क्रिया की भौतिक या परोक्ष रूप में उपस्थिति अनिवार्य होती है, इसीलिए कहा तो यह भी जाता है कि हिन्दी की क्रिया नहीं, तो हिन्दीं का वाक्य भी नहीं, इसीलिए मान्यता है कि हिन्दी की क्रिया में ही हिन्दी का वाक्य गर्भित रहता है। यही कारण है कि हिन्दी व्याकरण को जानने के लिए जरूरी है कि हिन्दी क्रिया के साहचर्य को हम जानें।
ऐसे ही हिंदी के टिप्पणीशब्द के विशेषण बन सकते हैं- सख्त, मीठी, कड़वी, मुलायम, तीखी, टेढ़ी, कमजोर और हल्की आदि या इस तरह के अन्य शब्द।
आज जरूरत इस बात की है कि हिंदी भाषा के भीतर उसके भाषिक पाठ में  पाठ के प्रत्येक स्तर के घटकों को देखते हुए या उन्हें रेखांकित करते हुए हम उनके साहचर्य को भी रेखंाकित कर सकंे और उस साहचर्य को हिंदी के भाषा-व्याकरण को सीखने वालों के मन में उतार सकें, पर वह उतारा तब जा सकेगा, जब हमें यह पता हो कि हिंदी भाषा के बनाने वाले जितने भी घटक हैं, वे-सब घटक किन-किन परिस्थितियों में किन-किन स्तरों पर किन-किन क्रियाओं के साथ आते हैं और यदि हम यह भी रेखांंिकत कर सकें कि यह विशेष घटक इन-इन के साथ नहीं आता, या इन-इन क्रियाओं के साथ ये घटक नहीं आते हैं, तो हिंदी भाषा सीखने वाला इस भाषा में स्वीकृत प्रयोग को ही सीखेगा और हिंदी भाषा में जो स्वीकृत प्रयोग नहीं हैं, उन्हें नकार सकने में भी समर्थ हो सकेगा अर्थात् वह हिंदी भाषा के अप्रयोग से भी अपने को पूरी तरह रोक सकेगा।

भाषा में साहचर्य
वृषभ प्रसाद जैन

मेरे वि़द्यागुरु पद्मभूषण आचार्य पण्डित विद्यानिवास मिश्र जी अक्सर यह कहते थे कि किसी भी भाषा को और उसके व्याकरण को सीखने के लिए भाषा में व्याप्त या भाषा की प्रकृति में व्याप्त साहचर्यको जानना चाहिए। अब प्रश्न उठेगा कि साहचर्यक्या है?......... भाषा में रहने वाली भाषिक इकाइयों का प्रयोग चाहे जहाँ या चाहे जिसके साथ नहीं होता। भाव यह है कि कौन-सी क्रिया किस अवस्था वाले कर्ता के साथ प्रयुक्त होती है या किस प्रकार की विशेष क्रिया के साथ कौन-सा कर्ता प्रयुक्त होता है, --यह जानना ही कर्ता और क्रिया के साहचर्य को जानना है या क्रिया और कर्ता के साहचर्य को जानना है। कोई भी भाषा स्वछन्द बिहार की अनुमति नहीं देती, वह अपने घटकांे के लिए यह निर्धारित करके चलती है कि कौन-सी इकाई किस घटक विशेष के साथ या किन्हीं दूसरे  घटकों के साथ किन विशेष परिस्थितियों में प्रयुक्त होती है। भाषा के सभी घटकों या सभी इकाइयों के सभी घटकों के सन्दर्भों की स्थिति विशेष को जानना, भाषा के घटकों के साहचर्य को जानना है। उदाहरण के लिए हिंदी की एक क्रिया भड़कनाको लेते हैं। अब देखना यह है कि यह भड़कनाक्रिया किस-किस प्रकार के कर्ताओं को लेती है या के साथ आती है। आज के दैनिक जागरण 27.3.2014 के पहले पेज का प्रमुख शीर्षक है लापरवाही से भड़का दंगा’, तो बात साफ हुई कि भडकनाक्रिया के साथ दंगा कर्ता में रूप में आ सकता है। .......पर क्या 1. पानी भड़का, या 2. बर्फ भड़की, या 3. गले का हार भड़का; आदि वाक्य हिंदी के स्वीकृत वाक्य हो सकते हैं?....... मुझे लगता हैं कि इन 1, 2, 3 वाक्यों में से कोई भी वाक्य हिंदी का स्वीकृत वाक्य नहीं है। इसका मतलब साफ हुआ कि भड़कनाक्रिया के साथ बर्फ की, पानी की, गले के हार की, कर्ता के रूप में हिंदी में स्वीकृत नहीं है। इसीलिए यह-सब भडकनाक्रिया के साहचर्य में नहीं हैं। भड़कनाक्रिया के साथ प्रमुख रूप में जो घटक आ सकते हैं, वे हैं- क्रोध, आग, व्यक्ति-विशेष, समूह-विशेष आदि-आदि। जैसे-
1.    इस गाँव में आग भड़की।
2.    उसका क्रोध भड़का।
3.    कैकेयी की बात सुनते ही राजा दशरथ भड़के (व्यक्तिवाचक)।
4.    मैं, तुम, आप (कोई भी सर्वनाम) भड़के।
5.      अफवाह फैलते ही भीड़ (समूह वाचक) भड़की।
ऐसे ही हिंदी की कुछ-और क्रियाओं को लेकर अब बात करते हैं- फड़कना’, इसका साहचर्य है आँख के साथ, हाथ के साथ, जंघा के साथ, ौंह के साथ, आदि-आदि।
एक और क्रिया है- जारी करना’ -इसके साथ आ सकते है आदेश, फरमान, नोटिस, पासपोर्ट, टिकट, वीजा, रसीद आदि-आदि। यथा- आदेश जारी करना, फरमान जारी करना, नोटिस जारी करना, पासपोर्ट जारी करना, टिकट जारी करना, वीजा जारी करना, रसीद जारी करना, आदि-आदि में।
एक और क्रिया है- पूरी करना। अब देखिये क्रिया पूरी करनाकिन-किन शब्दों के साथ प्रयुक्त होती है ज़रूरतें, माँगें, शर्तें, आवश्कताएँ, जिम्मेदारी, आदि-आदि। यथा- ज़रूरतें पूरी करना, माँगें पूरी करना, शर्तें पूरी करना, आवश्यकताएँ पूरी करना, जिम्मेदारी पूरी करना, आदि-आदि में।
एक और क्रिया है- हासिल करना’ -इसके साथ जो शब्द आते हैं, वे हैं- ऊर्जा, कुव्वत, शिक्षा, सहानुभूति, शिल्प, दौलत, आदि-आदि। जैसे- ऊर्जा हासिल करना, कुव्वत हासिल करना, शिक्षा हासिल करना, सहानुभूति हासिल करना, शिल्प हासिल करना, दौलत हासिल करना, आदि-आदि में।
एक और क्रिया है-अच्छा होना’ -इसके साथ आ सकते हैं- सेहत, माली हालत, पहले से, आदि-आदि। जैसे- सेहत अच्छा होना, माली हालत में अच्छा होना, पहले से अच्छा होना, आदि-आदि में।
अब एक और क्रिया अदा करनाको लेते हैं- इसके साथ शब्द जो आ सकते हैं, वे हैं- कर्ज़ा, शुक्रिया, बिल, किराया, आदि-आदि। जैसे- कर्ज़ा अदा करना, शुक्रिया अदा करना, बिल अदा करना, किराया अदा करना, आदि-आदि में।
एक क्रिया है रोना। इस क्रिया का कर्ता कोई प्राणवान् और संवेदनशील व्यक्ति या उसका वाचक सर्वनाम ही हो सकता है, अन्य कोई नहीं तथा यह रोनाक्रिया दःुख-वाचक, पीड़ा-वाचक या अत्यधिक प्रसन्नता-वाचक परिस्थित में ही घटती है  इसलिए इसप्रकार की स्थिति-वाचक कोई अधिकरण संरचना भी आ सकती है। यह है रोनाक्रिया का साहचर्य। उदाहरण -
1.    पुत्र पिता की मृत्यु पर रोया।
2.    गुरु के पीटने पर छात्र रोया।
3.    कोई वारिस न था, नाती के जन्म होने पर दादी हर्ष से रो पड़ी, उसकी आँखो में आँसू छलक आए।
एक क्रिया है जाना। हिन्दी की जानाक्रिया ऐसी है कि वह सभी प्रकार की कारक संरचनाओं को लेती है। भाव यह है कि हन्दी की जानाक्रिया के साथ सभी प्रकार की कारक संरचनाओं का साहचर्य स्वीकृत है।
मोहन रासन और पैसा लाने के लिए बस से कानपुर से अपने पिता जी के गाँव सोहनपुर रात में जा रहा है।
    अब देखिए ऊपर के इस वाक्य में कर्ता से लेकर अधिकरण तक की वाचक सभी संरचनाएँ आई हैं, यहाँ तक कि इसमें सम्बन्ध-वाचक संरचना भी प्रयुक्त हुई है, पर इसप्रकार की सभी संरचनाएँ इससे पहले उल्लखित सभी क्रियाओं के साथ नहीं  आ सकतीं, क्योंकि हिन्दीं भाषा की प्रकृति में विद्यमान साहचर्य उस तरह की अनुमति नहीं देता। हिन्दीं वाक्य के व्याकरण में क्रिया की भौतिक या परोक्ष रूप में उपस्थिति अनिवार्य होती है, इसीलिए कहा तो यह भी जाता है कि हिन्दी की क्रिया नहीं, तो हिन्दीं का वाक्य भी नहीं, इसीलिए मान्यता है कि हिन्दी की क्रिया में ही हिन्दी का वाक्य गर्भित रहता है। यही कारण है कि हिन्दी व्याकरण को जानने के लिए जरूरी है कि हिन्दी क्रिया के साहचर्य को हम जानें।
ऐसे ही हिंदी के टिप्पणीशब्द के विशेषण बन सकते हैं -- सख्त, मीठी, कड़वी, मुलायम, तीखी, टेढ़ी, कमजोर और हल्की आदि या इस तरह के अन्य शब्द।

आज जरूरत इस बात की है कि हिंदी भाषा के भीतर उसके भाषिक पाठ में पाठ के प्रत्येक स्तर के घटकों को देखते हुए या उन्हें रेखांकित करते हुए हम उनके साहचर्य को भी रेखांकित कर सकें और उस साहचर्य को हिंदी के भाषा-व्याकरण को सीखने वालों के मन में उतार सकें, पर वह उतारा तब जा सकेगा, जब हमें यह पता हो कि हिंदी भाषा के बनाने वाले जितने भी घटक हैं, वे-सब घटक किन-किन परिस्थितियों में किन-किन स्तरों पर किन-किन क्रियाओं के साथ आते हैं और यदि हम यह भी रेखांकित कर सकें कि यह विशेष घटक इन-इन के साथ नहीं आता, या इन-इन क्रियाओं के साथ ये घटक नहीं आते हैं, तो हिंदी भाषा सीखने वाला इस भाषा में स्वीकृत प्रयोग को ही सीखेगा और हिंदी भाषा में जो स्वीकृत प्रयोग नहीं हैं, उन्हें नकार सकने में भी समर्थ हो सकेगा अर्थात् वह हिंदी भाषा के अप्रयोग से भी अपने को पूरी तरह रोक सकेगा।